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Poetry

कवितायें

उलझन

ख़ूबसूरत हो बहुत तुम दिलबर
मैं हर इक चाहने वाले की तरह
अपनी चाहत के पाक सदके में
तुमको इक नाम देना चाहता हूँ...

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नारी

गौरा, सती अनुसूया, काली
तू थी दुर्गा शक्तिशाली
तू थी जननी-मननी-धरणी
तू थी सारे संकट हरणी

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फ़िक्र

झुलसती सदियाँ बरसते पल
न आज और न है कोई कल
यहाँ से बीतोगे तो कहाँ पे
रुकेगा लश्कर किसे पता है?

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अलीगढ़ की यादों में

हूँ दूर सभी अहबाबों से
इन तन्हाई के लम्हों में
खुल जाती हैं कभी कभी
गांठे वो चहल पहल वाली

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