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ख़ूबसूरत हो बहुत तुम दिलबर
मैं हर इक चाहने वाले की तरह
अपनी चाहत के पाक सदके में
तुमको इक नाम देना चाहता हूँ...
झुलसती सदियाँ बरसते पल
न आज और न है कोई कल
यहाँ से बीतोगे तो कहाँ पे
रुकेगा लश्कर किसे पता है?
हूँ दूर सभी अहबाबों से
इन तन्हाई के लम्हों में
खुल जाती हैं कभी कभी
गांठे वो चहल पहल वाली